अयोध्या से पहले मस्जिद में नमाज़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा सुप्रीम फैसला, जाने क्या है मामला ?

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अयोध्या के राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट आज एक अहम सवाल पर फैसला देगा। दरअसल, शीर्ष अदालत आज इस पर फैसला सुना सकता है कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है या नहीं और क्या इस मामले को बड़े संवैधानिक बेंच को भेजा जाए? बता दें कि अयोध्या का राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। अयोध्या की जमीन किसकी है, इस पर अभी सुनवाई की जानी है।

दरअसल, मुस्लिम पक्षकारों की ओर से दलील दी गई है कि 1994 में इस्माइल फारूकी केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में कहा है कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है और ऐसे में इस फैसले को दोबारा परीक्षण की जरूरत है और इसी कारण पहले मामले को संवैधानिक बेंच को भेजा जाना चाहिए। फैसला दो बजे के करीब आने की उम्मीद है।

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5 दिसंबर 2017 को जब अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये मामला महज जमीन विवाद है। लेकिन इसी दौरान मुस्लिम पक्षकार की ओर से पेश राजीव धवन ने कहा कि नमाज पढ़ने का अधिकार है और उसे बहाल किया जाना चाहिए। नमाज अदा करना धार्मिक प्रैक्टिस है और इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। ये इस्लाम का अभिन्न अंग है।

क्या मुस्लिम के लिए मस्जिद में नमाज पढ़ना जरूरी नहीं है? धवन ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में दिए फैसले में कहा था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला 1994 के जजमेंट के आलोक में था और 1994 के संवैधानिक बेंच के फैसले को आधार बनाते हुए फैसला दिया था जबकि नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग है और जरूरी धार्मिक गतिविधि है और ये इस्लाम का अभिन्न अंग है।

इस संदर्भ में देखा जाए तो सबसे पहले 1994 के संवैधानिक बेंच के फैसले को दोबारा विचार करने की जरूरत है क्योंकि उस जजमेंट के तहत मस्जिद में नमाज पढ़ने का अधिकार खत्म होता है। अदालत ने कहा है कि मामले में कोर्ट इस पहलू पर फैसला लेगा कि क्या 1994 के सुप्रीम कोर्ट से संवैधानिक बेंच के फैसले को दोबारा देखने के लिए मामले को संवैधानिक बेंच भेजा जाए या नहीं। इसी मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी फैसला सुरक्षित किया है। संवैधानिक बेंच के सामने मामला जाएगा या नहीं उस फैसले के बाद ही जमीन विवाद मामले की सुनवाई शुरू होगी।

अगर SC का फैसला याचाकिकर्पता के पक्ष में आया तो?

अगर शीर्ष अदालत पांच जजों की बेंच के फैसले को बड़े संवैधानिक बेंच को भेजना का फैसला करती है तो अयोध्या विवाद का केस टल जाएगा। अगर सुप्रीम कोर्ट यह फैसला देता है कि इस्माइल फारुकी वाले केस पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है तो अयोध्या मामले की सुनवाई जारी रहेगी। अगर फैसला मुस्लिम संगठनों के पक्ष में आता है तो यह हिंदू पक्षकारों के लिए एक तरह से झटका होगा। वहीं, अगर शीर्ष अदालत अपने पुराने फैसले को बररकार रखेगी तो यह मुस्लिम पक्षकारों के लिए मुश्किल वाला मसला होगा।

मुख्य मामला जमीन विवाद

राम मंदिर के लिए होने वाले आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था। इस मामले में आपराधिक केस के साथ-साथ दीवानी मुकदमा भी चला। टाइटल विवाद से संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाई हाई कोर्ट ने दिए फैसले में कहा था कि तीन गुंबदों में बीच का हिस्सा हिंदुओं का होगा जहां फिलहाल रामलला की मूर्ति है।

निर्मोही अखाड़ा को दूसरा हिस्सा दिया गया इसी में सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल हैं बाकी एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया। इस फैसले को तमाम पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बहाल कर दिया।

इस मामले में टाइटल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई और तमाम दस्तावेज के ट्रांसलेंशन किए गए। लेकिन पहले दिन ही सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारों के वकील कपिल सिब्बल ने ये दलील देकर विवाद खड़ा कर दिया था कि सुनवाई में इतनी जल्दी क्यों है।

सुनवाई जुलाई 2019 के बाद होनी चाहिए। उनका इशारा आम चुनाव के बाद सुनवाई करने को लेकर था। सिब्बल का कहना था कि ये साधारण जमीन विवाद नहीं है।

वहीं हिंदू पक्षकारों के वकील हरीश साल्वे की दलील थी कि मामला सात साल से पेंडिंग है। कोर्ट को इससे मतलब नहीं होता कि बाहर क्या हो रहा है और जुलाई 2019 तक सुनवाई टालने से गलत संदेह जाएगा।

अयोध्या से पहले मस्जिद पर सुप्रीम फैसला

मस्जिद और नमाज…सबसे बड़ा फैसला आज #ATVideoअन्य वीडियो : http://bit.ly/at_videos

Posted by Aaj Tak on Wednesday, September 26, 2018

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