कोरोना संकट के बीच मुसलमानों के खुद्दारी की कहानी, धर्मवीर यादव की जुबानी

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ये प्रवासी मजदूर हैं। सब के सब मुसलमान हैं। बिहार के कटिहार जिले से हैं। आजमगढ़ में मजदूरी करने आए थे। लॉक डाउन की वजह से यहीं फस गए। अब इनके पास कोई काम नहीं है। खाने पीने को राशन नहीं है। जो कुछ जमापूंजी थी, धीरे धीरे खत्म हो गयी।

कल उनमें से एक ने मुझे उनकी हालत बताई तो मैंने उसे राशन दे दिया। आज जब फिर मैंने उन्हें बुलाकर राशन और कुछ पैसा देना चाहा तो उन्होंने जबरदस्ती मेरे अहाते में खाली पड़ी जमीन को खोदना शुरू कर दिया। कहने लगे- भैया जी सब्जी लगा लीजिएगा।

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इतने मुश्किल वक्त में भी उनकी खुद्दारी देखकर मन द्रवित हो उठा। आधे घंटे में ही उन्होंने जमीन के टुकड़े को बोने लायक बना दिया। इस दौरान इन्होंने शारीरिक दूरी का भी ख्याल रखा। पापा इनकी मदद के लिए जिलाधिकारी से बात करेंगे। उम्मीद है इनको सरकारी मदद मिलेगी।

मीडिया के दलालों और गली मोहल्ले के जोम्बियों सुन लो- “मेरे लिए ये मुसलमान नहीं, मनुष्य हैं; मजदूर हैं; मेहनतकश अवाम हैं मेरे देश की।”

कोरोना संकट के बीच धर्मवीर यादव का ये संदेश फेसबुक पर जमकर वायरल हो रहा है. इस संदेश को अब तक 7000 से भी अधिक लोगों ने लाइक किया है और 4300 से अधिक बार शेयर भी किया जा चूका है.

इसके अलावा ये संदेश ट्विटर पर इस्राइल मलिक नाम के यूजर ने शेयर करते हुए लिखा है मुस्लिमों की कहानी, हिंदू भाई की जुबानी. ट्विटर पर इस संदेश को न्यूज़24 की जानी-मानी पत्रकार साक्षी जोशी ने भी रिट्वीट किया है.

अधिवक्ता धर्मवीर यादव की फेसबुक वाल से लिया गया लेख.

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